किसानों की मौत का हिसाब: मराठवाड़ा में 5 साल में 5000 से ज्यादा आत्महत्याएं
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संवाद 24 महाराष्ट्र। मराठवाड़ा कृषि क्षेत्र में पिछले पांच वर्षों में किसानों की भारी आत्महत्या की संख्या ने सरकारी रिपोर्टों को हिलाकर रख दिया है। 2021 से 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, केंद्रीय महाराष्ट्र के मराठवाड़ा मंडल में अब तक कुल 5,075 किसान आत्महत्या कर चुके हैं, जिनमें 2025 का वर्ष अकेले अब तक का सबसे काला पड़ाव रहा है।
लगातार बढ़ता संकट
उन आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़ 2021 में मराठवाड़ा में 887 किसानों ने आत्महत्या की थी, फिर 2022 में यह संख्या बढ़कर 1,023 हुई। 2023 में 1,088, 2024 में 948 और 2025 में 1,129 किसानों ने खुदकुशी की। ये लगातार पांच वर्षों का रिकॉर्ड एक गहन और कहानी-पोस्टर संकट की ओर संकेत कर रहा है। मराठवाड़ा मंडल में आठ जिले शामिल हैं — छत्रपति संभाजीनगर, जलना, परभनी, नांदेड, बीड, धरणशिव, हिंगोली और लातूर। इनमें से 2025 में सबसे अधिक 256 आत्महत्याएं बीड जिले में दर्ज की गईं, इसके बाद संभाजीनगर के 224, नांदेड के 170 और परभनी के 104 आंकड़े आए।
मौसम की मार और कृषि आपदा
अधिकारियों की रिपोर्ट बताती है कि 2025 के दौरान मराठवाड़ा में असामान्य बारिश और अचानक आई बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपत्तियों ने फसल उत्पादन को तहस-न-हस कर दिया। मई से अक्टूबर के बीच जब किसानों को उम्मीद थी कि वर्षा उनकी फसलों के लिए सहायक होगी, तब 125% से 150% तक अतिरिक्त बारिश ने फसलें ही नष्ट कर दीं। इसके परिणामस्वरूप 537 आत्महत्याएं इसी छह-महीने की अवधि में दर्ज की गईं। यह अनियमित वर्षा न केवल फसलों को प्रभावित करती है, बल्कि जमीन की उर्वरता, बुवाई-कटाई चक्र और किसान की रोज़ी-रोटी को भी सीधे तौर पर प्रभावित करती है। सरकारी सहायता कार्यक्रमों की धीमी कार्यवाही और अनावश्यक प्रक्रियाओं ने किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
कर्ज़ बोझ और आत्महत्या का चक्र
कृषि संकट का प्रमुख कारण किसानों की भारी कर्ज़ की समस्या रही है। ऊँची ब्याज दरों, खराब बाजार मूल्यों और मौसम की अस्थिरता ने किसानों को आर्थिक रूप से बुरी तरह से जकड़ रखा है। जब फसलें नष्ट होती हैं और बाजार से उचित मूल्य नहीं मिलता, तो कर्ज़ लौटाना लगभग असंभव हो जाता है — जिससे मानसिक दबाव और पारिवारिक संकट बढ़ते जाते हैं। सरकार ने मराठवाड़ा में आत्महत्या करने वाले किसानों के परिजनों को मानहानि भत्ते और आर्थिक सहायता देने की कोशिश की है, लेकिन कई मामलों में यह सहायता समय पर नहीं पहुंच पाई और कुछ परिवारों को तो अयोग्य घोषित कर दिया गया।
कहानी का मानवीय पक्ष
इन आत्महत्याओं का सिर्फ़ आंकड़ों तक सीमित असर नहीं है — यह सामाजिक और मनोवैज्ञानिक तौर पर भी गहरा प्रभाव छोड़ता है। पीछे रह जाने वाले परिवार आर्थिक कठिनाइयों, बच्चों की पढ़ाई में अवरुद्धता और सामाजिक कलंक जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। उन पर कर्ज़ का भार बढ़ता जा रहा है, और कई बच्चे मजबूरी में पढ़ाई छोड़कर काम करने के लिए मजबूर हैं।






