मनुस्मृति का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, विधवा बहू को ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण का अधिकार
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संवाद 24 नई दिल्ली। विधवा बहू के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला अपने ससुर के निधन के बाद विधवा होती है, तब भी वह ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण की हकदार रहेगी। अदालत ने कहा कि इस अधिकार को समय या परिस्थितियों के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनाया, जिसमें न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी शामिल थे। अदालत ने हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की व्याख्या करते हुए कहा कि मृत व्यक्ति की संपत्ति से उसके आश्रितों का भरण-पोषण करना उत्तराधिकारियों की कानूनी जिम्मेदारी है, और इसमें विधवा बहू भी शामिल है।
भ्रम को किया खत्म
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में उस धारणा को खारिज कर दिया, जिसके तहत यह माना जाता था कि यदि बहू ससुर के जीवित रहते विधवा हो जाए तो उसे भरण-पोषण मिलेगा, लेकिन ससुर की मृत्यु के बाद विधवा होने की स्थिति में यह अधिकार समाप्त हो जाता है। अदालत ने कहा कि इस तरह का अंतर “अतार्किक और असंगत” है और कानून इसकी अनुमति नहीं देता।
कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी
पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि बेटा नहीं रहा और बहू स्वयं अपनी आजीविका चलाने में असमर्थ है, तो ससुर की यह नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है कि वह उसका भरण-पोषण करे। यह जिम्मेदारी ससुर की मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होती, बल्कि उनकी संपत्ति से उनके उत्तराधिकारी इसे निभाने के लिए बाध्य होंगे।
मनुस्मृति का संदर्भ
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मनुस्मृति का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि पारंपरिक भारतीय समाज में परिवार के किसी भी आश्रित मां, पिता, पत्नी या पुत्र को असहाय छोड़ना अनुचित माना गया है। कोर्ट ने जोर दिया कि कानून की संकीर्ण व्याख्या कर विधवा बहू को भरण-पोषण से वंचित करना उसे सामाजिक और आर्थिक रूप से अकेला छोड़ने जैसा होगा।
व्यापक असर वाला निर्णय
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला देशभर में लंबित और भविष्य के ऐसे मामलों में मिसाल बनेगा, जहां विधवा बहुओं के भरण-पोषण के अधिकार पर विवाद है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से पारिवारिक संपत्ति और आश्रितों के अधिकारों को लेकर न्यायिक दृष्टिकोण और अधिक स्पष्ट हो गया है।






