सेना की नई सोच: इन्फैंट्री में महिलाओं की एंट्री अब समाज की स्वीकृति से संभव
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संवाद 24 नई दिल्ली। भारतीय थल सेना के शीर्ष पद पर बैठने वाले सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने ऐतिहासिक संकेत दिए हैं कि अब भारतीय सेना की इन्फैंट्री (पैदल फ़ोर्स) में महिलाओं की सेवा की राह भी खुल सकती है — बशर्ते समाज इस बदलाव के लिए तैयार हो। यह विचार देश में लैंगिक समानता और आधुनिक सेनानयनों को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
समाज की भूमिका पर ज़रूरी सवाल
जनरल द्विवेदी का बयान स्पष्ट करता है कि केवल सैन्य फैसलों से बदलाव नहीं होंगे, बल्कि समाज और पारिवारिक समर्थन भी बराबर ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि महिला कमांडरों की भूमिका और छवि को स्वीकृति मिलने से ही इन्फैंट्री जैसी चुनौतीपूर्ण पोज़िशन में उनकी नियुक्ति और सफल कर सकेंगे।
लीडरशिप का व्यापक दृष्टिकोण
सेना प्रमुख ने यह भी बताया कि वे हमेशा से लैंगिक तटस्थता और समान अवसर के पक्षधर रहे हैं। उनका मानना है कि अगर देश इंगेज़मेंट के स्तर पर महिलाओं को बराबरी से स्वीकार करता है, तो भारतीय सेना भविष्य में महिलाओं को इन्फैंट्री और अन्य कॉम्बैट रोल्स में भी शामिल कर सकती है।
यह विचार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पारंपरिक रूप से इन्फैंट्री को सबसे कठिन और जोखिम भरा युद्ध क्षेत्र माना जाता रहा है। महिलाएं पहले से ही सेना की कई शाखाओं में सफलतापूर्वक सेवा दे रही हैं — चाहे वह ट्रैनिंग, कमांड नियुक्तियाँ, या ऑपरेशनल बेस की ज़िम्मेदारियाँ हों।
समावेशी सुरक्षा ढांचे की दिशा
सेना में पहले से ही महिलाओं की भर्ती चल रही है। सेना मुख्यालय ने पिछले कुछ वर्षों में लाखों रुपये की वृद्धि के साथ महिला अधिकारियों को बढ़ावा देने और उन्हें अग्रिम मोर्चों पर भेजने जैसे कई सकारात्मक कदम उठाए हैं। तैयार किये जा रहे कॉम्बैट फिटनेस मापदंड भी महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए संतुलित हैं, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी वर्ग पीछे न रह जाए। साथ ही, महिलाओं की भूमिका सिर्फ़ फ्रंटलाइन में ही सीमित नहीं रहेगी — उन्हें संचालन, रणनीति, प्रशिक्षण और नेतृत्व की भूमिका में भी तैयार किया जा रहा है। ये कदम भारतीय सेना के समग्र समावेशी सुरक्षा ढांचे को और अधिक प्रभावी, आधुनिक और सक्षम बनाएंगे।
लोक समर्थन से मिलेगा अंतिम बल
जनरल द्विवेदी ने जोर देकर कहा कि सेना तो हर तकनीकी, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक तैयारी कर सकती है, लेकिन अंतिम चुनौती समाजिक स्वीकार्यता की है। जब तक परिवार, समाज और देश की सोच महिलाओं को इन उन्नत युद्धभूमिकाओं के लिए तैयार नहीं मानते, तब तक यह बदलाव धीमा रहेगा। यह बयान उस बड़े बदलाव का संकेत है जो भारत की सुरक्षा नीतियों में आने वाला है — जहां महिलाएं न सिर्फ़ सहायक भूमिकाओं में बल्कि जटिल और जोखिम भरे युद्ध क्षेत्र में भी भाग ले सकेंगी। यह बात भारतीय सेना को एक और आधुनिक, सक्षम और वीभत्स अस्तित्व के रूप में स्थापित करेगी।






