
संवाद 24 दिल्ली। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने मानवता और संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता देते हुए एक बहु-दिव्यांग महिला के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने कोल इंडिया लिमिटेड को निर्देश दिया है कि वह महिला को बिना किसी देरी के नौकरी प्रदान करे। यह फैसला दिव्यांग अधिकारों और समान अवसर के सिद्धांत को मजबूती देता है।
भर्ती में सफल होने के बावजूद नौकरी से वंचित रही महिला
पीड़ित महिला वर्ष 2019 में कोल इंडिया की मैनेजमेंट ट्रेनी भर्ती प्रक्रिया में सफल हुई थी। सभी योग्यताएं पूरी करने के बावजूद उसे मेडिकल परीक्षण के दौरान बहु-दिव्यांगता के आधार पर अयोग्य घोषित कर दिया गया, जिससे उसका सपना अधूरा रह गया।
हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलटा
इस मामले में पहले कलकत्ता उच्च न्यायालय ने महिला को राहत देने से इनकार कर दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि महिला के साथ अन्याय हुआ है और यह संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है।
विशेष पद सृजित कर नौकरी देने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने कोल इंडिया के चेयरमैन को निर्देश दिया कि महिला के लिए एक विशेष (सुपरन्यूमेरेरी) पद सृजित किया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि दिव्यांगता किसी की क्षमता को कम नहीं करती, बल्कि सही वातावरण और सहयोग से व्यक्ति बेहतर प्रदर्शन कर सकता है।
डेस्क जॉब और विशेष सुविधाएं देने के आदेश
कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला को उसकी स्थिति के अनुसार उपयुक्त डेस्क जॉब दी जाए। इसके साथ ही अलग कंप्यूटर, कीबोर्ड और आवश्यक सहायक उपकरण उपलब्ध कराए जाएं, ताकि वह बिना किसी बाधा के अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सके।
दिव्यांग अधिकार कानून का हवाला
न्यायालय ने अपने आदेश में Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 का उल्लेख करते हुए कहा कि कानून नियोक्ताओं को दिव्यांग व्यक्तियों के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराने का निर्देश देता है। यह केवल कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है।
अनुच्छेद 142 के तहत विशेष अधिकारों का प्रयोग
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग किया, ताकि महिला को पूर्ण न्याय मिल सके। अदालत ने कहा कि यह आदेश विशेष परिस्थितियों में दिया गया है।
देशभर के लिए एक मजबूत संदेश
यह फैसला सिर्फ एक महिला को न्याय दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश को यह संदेश देता है कि योग्यता के आधार पर अवसर मिलना हर नागरिक का अधिकार है। दिव्यांगता किसी के सपनों के आड़े नहीं आनी चाहिए।
समानता और समावेशन की दिशा में बड़ा कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के लिए एक मिसाल बनेगा। इससे रोजगार में समावेशन को बढ़ावा मिलेगा और समाज में समानता की भावना और मजबूत होगी।






