सुप्रीम कोर्ट की कड़ी चेतावनी: “कुत्तों के काटने पर भारी मुआवजा, राज्यों और डॉग लवर्स की जवाबदेही तय होगी”
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संवाद 24 नई दिल्ली। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आवारा कुत्तों से होने वाले हमलों और काटने की घटनाओं को अब केवल एक नागरिक सुरक्षा मुद्दा नहीं, बल्कि एक कानूनी जवाबदेही और मुआवजे का मामला घोषित कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि कुत्तों के काटने से कोई व्यक्ति घायल होता है या उसकी मृत्यु हो जाती है, तो राज्य सरकारों पर भारी मुआवजा देने का दायित्व लगाया जा सकता है। यह दिशा भारत में आवारा कुत्तों के बढ़ते संकट पर न्यायिक चिंता को दर्शाती है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य, सुरक्षा और प्रशासनिक सुस्ती को चुनौती देती है।
न्यायालय की तीन सदस्यीय बेंच, जिसमें न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजनारिया शामिल हैं, ने यह विचार व्यक्त किया कि “कुत्तों के काटने के प्रभाव हमेशा के लिए हो सकते हैं” और अगर राज्य उचित व्यवस्था नहीं बनाते हैं तो भारी मुआवजा देना पड़ेगा।” कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे लोग या संगठन जो आवारा कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों पर खिलाते हैं, उन्हें भी संभावित रूप से जवाबदेह माना जा सकता है।
न्यायालय का तर्क और चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठाया कि अगर नौ साल का बच्चा कुत्तों के काटने का शिकार होता है, तो किस पर जिम्मेदारी होगी, क्या वही लोग या संगठन जो कुत्तों को नियमित रूप से खिलाते हैं? “अगर आप उन्हें खाना देते हैं, तो उन्हें अपने घर ले जाइए। क्यों कुत्तों को घूमने, काटने और लोगों को डराने की अनुमति दी जा रही है?” न्यायमूर्ति नाथ ने कहा। कोर्ट ने विशेष रूप से यह भी रेखांकित किया कि आवारा कुत्तों के संबंध में प्रशासनिक जवाबदेही का मुद्दा कई दशकों से अव्यवस्थित है। अदालत ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा “पशु जन्म नियंत्रण (ABC) नियमों” को प्रभावी तरीके से लागू न करने के कारण समस्या हजारों गुना बढ़ गई है।
पिछली दिशा-निर्देश और लागू कदम
यह विवाद 7 नवंबर, 2025 के आदेश से शुरू हुआ था, जब सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि स्कूल, अस्पताल, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और अन्य सार्वजनिक जगहों से आवारा कुत्तों को हटाया जाए और उन्हें उचित आश्रयों में स्थानांतरित किया जाए। उन कुत्तों को वैक्सीनेट और नसबंदी के बाद वापस उसी स्थान पर नहीं छोड़ा जाना था। हाल ही में पंजाब जैसे राज्यों ने भी कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप कदम उठाना शुरू कर दिया है — यहां स्वास्थ्य विभाग ने सार्वजनिक संस्थानों की परिसरों को सुरक्षित करने और अनचाहे कुत्तों से बचाने के लिए कार्रवाइयां तेज कर दी हैं।
राज्य-स्तर पर मुआवजा उदाहरण
कर्नाटक सरकार ने पहले ही दिशा-निर्देशों के आधार पर एक पहल की घोषणा की है, जिसमें आवारा कुत्तों के काटने से मौत होने पर परिवारों को ₹5 लाख का मुआवजा और गंभीर घायल लोगों को ₹5,000 तक का मुआवजा देने की व्यवस्था शामिल है।
कानूनी और सामाजिक बहस
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में इस विषय पर गहन बहस भी हुई। कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं और पशु कल्याण समूहों ने सुझाव दिया कि इस समस्या का समाधान वैज्ञानिक और मानवीय तरीके से खोजा जाना चाहिए, न कि केवल दंडात्मक कदम उठाकर। उन्होंने कहा कि कुत्तों को मारने या निरंतर प्रतिबंधित रखने की बजाय जन-स्वास्थ्य दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। इसके विपरीत, कोर्ट ने कहा कि समस्या इतनी गंभीर हो चुकी है कि यदि प्रशासन आवश्यक नियंत्रण उपाय नहीं करता है, तो न्यायिक व्यवस्था इसे अनदेखा नहीं कर सकती।






