असम से प्रियंका गांधी की ‘सियासी एंट्री’: कांग्रेस ने क्यों सौंपी सबसे अहम जिम्मेदारी?
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संवाद 24 नई दिल्ली। कांग्रेस ने असम विधानसभा चुनाव से पहले एक ऐसा दांव चला है, जिसे महज़ संगठनात्मक फैसला मानना भूल होगी। पार्टी ने Priyanka Gandhi Vadra को असम के लिए स्क्रीनिंग कमेटी का चेयरपर्सन बनाकर साफ कर दिया है कि इस बार मुकाबला सिर्फ भाषणों या रैलियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि टिकट वितरण से लेकर संगठनात्मक अनुशासन तक हर मोर्चे पर सख़्ती दिखाई देगी।
यह पहला मौका है जब गांधी परिवार के किसी सदस्य को सीधे तौर पर किसी विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार चयन की कमान दी गई है। राजनीतिक हलकों में इसे कांग्रेस की “नो रिस्क” रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
हिमंता के गढ़ में सीधी चुनौती
असम का राजनीतिक परिदृश्य इस फैसले को और धार देता है। राज्य के मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma न केवल भाजपा के सबसे आक्रामक और प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते हैं, बल्कि गांधी परिवार के मुखर आलोचक भी रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस का संदेश साफ है—हिमंता के राजनीतिक किले में पार्टी उसी नेतृत्व को उतार रही है, जिसकी संगठन पर सीधी पकड़ है।
दलबदल की आशंका और सख़्त निगरानी
पूर्वोत्तर की राजनीति में दलबदल कोई नई कहानी नहीं है। कांग्रेस पहले भी असम और अन्य राज्यों में इसका नुकसान झेल चुकी है। इसी अनुभव के चलते पार्टी इस बार उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया को पूरी तरह नियंत्रित रखना चाहती है। स्क्रीनिंग कमेटी के ज़रिये हर संभावित प्रत्याशी की राजनीतिक निष्ठा, जनाधार और वैचारिक प्रतिबद्धता की बारीकी से पड़ताल होगी।
सूत्रों के मुताबिक, प्रियंका गांधी से अपेक्षा है कि वे सिर्फ जीतने की क्षमता नहीं, बल्कि चुनाव के बाद पार्टी के साथ टिके रहने की विश्वसनीयता को भी प्राथमिक मानदंड बनाएंगी।
तकनीकी नहीं, निर्णायक भूमिका
भले ही स्क्रीनिंग कमेटी का काम बाहर से तकनीकी लगे, लेकिन असल में यही वह फ़िल्टर है जहां तय होता है कि केंद्रीय चुनाव समिति तक कौन-से नाम पहुंचेंगे। अंतिम मुहर भले ही CEC लगाए, लेकिन सूची की दिशा और चरित्र स्क्रीनिंग कमेटी ही तय करती है।
पुराने अनुभव, नई भूमिका
असम प्रियंका गांधी के लिए पूरी तरह नया इलाका नहीं है। 2021 के विधानसभा चुनाव में वे भले ही फ्रंटफुट पर न दिखी हों, लेकिन रणनीतिक फैसलों में उनकी भूमिका अहम मानी जाती है। इस बार भी पार्टी ने सीनियर ऑब्ज़र्वर के तौर पर Bhupesh Baghel और D. K. Shivakumar को मैदान में उतारा है, जो बताता है कि कांग्रेस असम को हल्के में नहीं ले रही।
संख्याएं जो उम्मीद जगाती हैं
2021 के विधानसभा चुनाव में 126 सीटों वाले असम में NDA को 75 और कांग्रेस गठबंधन को 50 सीटें मिली थीं। वोट प्रतिशत का अंतर महज़ 1.6% रहा। यह आंकड़ा कांग्रेस के लिए उम्मीद की बड़ी वजह है। बेहतर तालमेल और मज़बूत उम्मीदवार चयन से मुकाबला पूरी तरह पलटा जा सकता है, और यही जिम्मेदारी अब प्रियंका गांधी के कंधों पर है।
UP की आहट भी साफ
असम की यह भूमिका सिर्फ एक राज्य तक सीमित संकेत नहीं देती। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रियंका गांधी को दोबारा केंद्र में लाने की तैयारी के संकेत भी इसी फैसले में छिपे हैं। असम में संगठनात्मक नियंत्रण और उत्तर प्रदेश में रणनीतिक सक्रियता—दोनों मिलकर यह बताते हैं कि कांग्रेस अब प्रियंका गांधी को सिर्फ स्टार प्रचारक नहीं, बल्कि निर्णायक राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में स्थापित करना चाहती है।






