मध्यम वर्ग के लिए ‘घर’ बनता जा रहा है एक कठिन सपना, नीति आयोग की नवीन रिपोर्ट की चौंकाने वाली सच्चाई
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संवाद 24 नई दिल्ली। भारत में मध्यम वर्ग के लिए किफायती आवास संकट अब सिर्फ एक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक चुनौती बन गया है। नीति आयोग ने हाल ही में एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि अधिकतर भारतीय मध्यम वर्गीय परिवार आज घर खरीदने के अपने सपने से दूर जा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार कोरोना महामारी के बाद देश में किफायती घरों का उपलब्ध स्टॉक तेजी से घटा है और 2019 से 2024 के बीच मध्यम वर्ग के लिए उपलब्ध किफायती मकानों का अनुपात लगभग 40% से गिरकर लगभग 16% तक आ गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि आय में मामूली वृद्धि होने के बावजूद, घरों की कीमतों में गतिशील उछाल ने घर को मध्यम वर्ग के बजट से बाहर कर दिया है।
नीति आयोग की रिपोर्ट में यह कहा गया है कि:
मध्यम आय वर्ग (जैसे ₹30,000–₹50,000 मासिक आय वाले) अपने वेतन का लगभग 40–60% हिस्सा केवल आवास पर खर्च कर रहे हैं। घर की कीमतें महामारी के बाद अधिक बढ़ी हैं, जबकि आमदनी की वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी है — इसके कारण घर खरीदना पहले से बहुत मुश्किल हो गया है। विश्लेषकों का कहना है कि मुख्य समस्या यह है कि रियल एस्टेट की कीमतें सैलरी और कर्ज़ की उपलब्धता से कहीं आगे निकल चुकी हैं। घरों की लागत में वृद्धि के साथ-साथ ब्याज दरों में भी उतार-चढ़ाव ने क्रेडिट लेना महँगा बना दिया है, जिससे मध्यम वर्ग पर वित्तीय दबाव और बढ़ा है।
नीति आयोग का समाधान: एक व्यापक ढांचा
नीति आयोग की रिपोर्ट सिर्फ समस्या का आकलन ही नहीं करती, बल्कि समाधान का एक साप्ताहिक रूपरेखा भी पेश करती है जिसमें प्रमुख सुझाव शामिल हैं: शहरों के मास्टर प्लान में किफायती आवास के लिए भूमि का कम-से-कम 10% हिस्सा आरक्षित करना। Transit-oriented development (TOD) के तहत मेट्रो और सार्वजनिक परिवहन के पास किफायती घरों का निर्माण। सभी नई आवास परियोजनाओं में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और निम्न आय वर्ग (LIG) के घरों का अनिवार्य आरक्षण। किराये के घरों के लिए बेहतर कानूनी ढांचा और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल का प्रोत्साहन। इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि किफायती घरों की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए, महानगरीय शहरों में 60 वर्ग मीटर तक और कीमत ₹60 लाख तक वाले घरों को किफायती माना जाना चाहिए। वहीं गैर-मेट्रो क्षेत्रों में यह सीमा 90 वर्ग मीटर और ₹45 लाख निर्धारित की गई है।
क्या निकलेगा मध्यम वर्ग को इसका लाभ?
नीति आयोग का मानना है कि इन सुधारों से आवास के विकल्प बढ़ेंगे, किफायती घरों का निर्माण सुगम होगा और आखिरकार घर खरीदने की क्षमता में सुधार आएगा। हालांकि, योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सरकार, वित्तीय संस्थान और प्राइवेट सेक्टर को एक समन्वित प्रयास करना होगा। देश की तेजी से बढ़ती शहरी आबादी के बीच यह समस्या केवल आर्थिक नहीं, बल्कि समाज की नींव से जुड़ा प्रश्न बन चुकी है — क्या मध्यम वर्ग को भी अपने सपनों का घर मिल पाएगा? इस पर निर्भर करेगा कि सरकारी नीतियां कितनी तेजी और प्रभावी ढंग से लागू होती हैं।






