GDP तेज़, राज्यों की तिजोरी खाली? बजट से पहले केंद्र के सामने राज्यों की बड़ी मांग, टैक्स हिस्सेदारी और सेस पर उठे सवाल
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संवाद 24 नई दिल्ली। देश की अर्थव्यवस्था जहां तेज़ रफ्तार से आगे बढ़ती दिख रही है, वहीं राज्यों की वित्तीय सेहत पर चिंता गहराती जा रही है। चालू वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था के 7.4% की दर से बढ़ने के अनुमान के बीच राज्यों ने दावा किया है कि उनकी आमदनी घट रही है। आम बजट से पहले हुई अहम बैठक में राज्यों ने केंद्र सरकार से विशेष वित्तीय राहत और कर व्यवस्था में बदलाव की मांग की है।
यह मुद्दा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ हुई प्री-बजट बैठक में जोर-शोर से उठाया गया, जिसमें कई राज्यों के वित्त मंत्रियों ने हिस्सा लिया।
GST कटौती से घटा राजस्व
राज्यों ने बताया कि सितंबर में Goods and Services Tax (GST) की कुछ दरों में कटौती के बाद उनके राजस्व पर सीधा असर पड़ा है। एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार, इससे चालू वित्त वर्ष में केंद्र और राज्यों को मिलाकर करीब 1.11 लाख करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान की आशंका है। हालांकि, खपत बढ़ने से वास्तविक नुकसान कुछ हद तक कम हो सकता है, लेकिन राज्यों का कहना है कि तात्कालिक दबाव उन्हीं पर पड़ रहा है।
सेस और सरचार्ज बना सबसे बड़ा विवाद
राज्यों ने केंद्र के टैक्स कलेक्शन में सेस और सरचार्ज के बढ़ते इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए। संविधान के अनुसार राज्यों को केंद्र के कर राजस्व का 41% हिस्सा मिलता है, लेकिन सेस और सरचार्ज इस दायरे से बाहर रहते हैं। राज्यों का तर्क है कि इससे उनकी हिस्सेदारी वास्तविक रूप से घट रही है और उन्हें भी इन मदों में हिस्सा मिलना चाहिए।
केंद्रीय योजनाओं में बढ़ता बोझ
बैठक में राज्यों ने यह भी कहा कि केंद्र की कई योजनाओं में उनकी वित्तीय हिस्सेदारी बढ़ा दी गई है, जबकि संसाधन सीमित हैं। इसके साथ ही राज्यों ने उधार सीमा बढ़ाने, प्राकृतिक आपदाओं के लिए विशेष पैकेज और अधिक लचीलापन देने की मांग रखी।
DBT स्कीमों से बढ़ी चिंता
कई राज्यों ने डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर (DBT) योजनाओं को लेकर भी चिंता जताई। चुनावी वादों के तहत चल रही इन योजनाओं पर बढ़ते खर्च से राज्यों का राजस्व घाटा बढ़ रहा है और बुनियादी ढांचे व विकास कार्यों के लिए संसाधन कम पड़ रहे हैं।
बजट से पहले दबाव
राज्यों की दलील साफ है, अगर GDP ग्रोथ का लाभ नीचे तक पहुंचाना है, तो राज्यों को मजबूत करना जरूरी है। बजट से ठीक पहले उठी इन मांगों ने केंद्र सरकार के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है: तेज़ आर्थिक विकास के बीच राज्यों की वित्तीय कमजोरी को कैसे दूर किया जाए?
अब निगाहें 1 फरवरी को पेश होने वाले आम बजट पर टिकी हैं, जहां यह साफ होगा कि केंद्र राज्यों की इन मांगों को कितनी अहमियत देता है।






