
संवाद 24 नई दिल्ली। तमिलनाडु की राजनीति में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। राज्य में उसकी सहयोगी DMK ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि चुनाव बाद गठबंधन सरकार या सत्ता-साझेदारी का कोई सवाल ही नहीं उठता।
DMK के वरिष्ठ नेता और ग्रामीण विकास मंत्री आई पेरियासामी ने रविवार को स्पष्ट शब्दों में कहा कि मुख्यमंत्री एम के स्टालिन कांग्रेस समेत किसी भी सहयोगी दल के साथ सत्ता साझा करने के पक्ष में नहीं हैं और पार्टी अपने इस रुख पर पूरी तरह अडिग है।
‘मांग करना अधिकार है, लेकिन सरकार साझा नहीं होगी’
कांग्रेस द्वारा सत्ता में हिस्सेदारी की मांग उठाए जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए पेरियासामी ने कहा कि सहयोगी दलों को अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन DMK ने कभी भी गठबंधन सरकार के मॉडल को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने दो टूक कहा कि तमिलनाडु में अब तक शासन की जिम्मेदारी हमेशा DMK ने अकेले संभाली है और आगे भी यही स्थिति रहेगी।
कांग्रेस की बढ़ती बेचैनी
गौरतलब है कि हाल के दिनों में तमिलनाडु कांग्रेस के कई नेताओं ने खुलकर सत्ता में भागीदारी की बात कही थी। कांग्रेस सांसद मणिक्कम टैगोर ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि अब सत्ता-साझेदारी पर गंभीर चर्चा का समय आ गया है। वहीं, कांग्रेस विधायक दल के नेता एस. राजेशकुमार और पार्टी के राज्य प्रभारी गिरीश चोडंकर ने भी इसी तरह के बयान देकर DMK पर दबाव बनाने की कोशिश की थी।
DMK का पुराना और स्पष्ट रुख
DMK की प्रतिक्रिया ने यह साफ कर दिया है कि पार्टी अपने ऐतिहासिक राजनीतिक मॉडल से हटने को तैयार नहीं है। वर्ष 1967 के बाद से तमिलनाडु में सत्ता में आई सरकारों में DMK और AIADMK ने गठबंधन में चुनाव लड़ने के बावजूद कभी भी मंत्रिमंडल में सत्ता साझा नहीं की।
2006 में DMK ने कांग्रेस के बाहरी समर्थन से सरकार जरूर चलाई थी, लेकिन तब भी मंत्रियों के पद सहयोगी दलों को नहीं दिए गए थे। उस समय भी कांग्रेस की मांगें अनसुनी रह गई थीं।
चुनाव से पहले बढ़ा गठबंधन में तनाव
DMK के इस सख्त रुख के बाद यह साफ संकेत मिल गया है कि तमिलनाडु में कांग्रेस की भूमिका एक बार फिर सीमित सहयोगी तक ही रहने वाली है। विधानसभा चुनाव से पहले यह बयान न सिर्फ कांग्रेस की रणनीति पर सवाल खड़े करता है, बल्कि गठबंधन के भीतर बढ़ते असंतुलन को भी उजागर करता है।






