एकचक्रा नगरी का नरभक्षी राक्षस जो हर हफ्ते इंसानों की बलि मांगता था, भीमसेन ने कैसे उसे यमलोक का रास्ता दिखाया
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संवाद 24 डेस्क। महाभारत के ‘आदि पर्व’ के अंतर्गत आने वाली बकासुर वध की घटना केवल एक असुर के विनाश की कहानी नहीं है, बल्कि यह ब्राह्मण धर्म की रक्षा, शरणागत की सुरक्षा और पांडवों के अज्ञातवास के दौरान उनके अटूट सेवा भाव का प्रतीक है। लाक्षागृह के षड्यंत्र से जीवित बच निकलने के बाद, पांडव अपनी माता कुंती के साथ व्यास जी के परामर्श पर एकचक्रा नगरी में एक ब्राह्मण के घर छिपकर रह रहे थे। इसी कालखंड में घटित हुई यह रोमांचक घटना न्याय और वीरता का अनुपम उदाहरण है।
एकचक्रा नगरी: भय का साया
एकचक्रा नगरी बाह्य रूप से शांत दिखाई देती थी, किंतु इसके भीतर एक गहरा और भयावह सन्नाटा पसरा हुआ था। इसका कारण था नगरी के समीप की गुफा में रहने वाला अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर राक्षस बकासुर। बकासुर ने वर्षों पहले नगर पर आक्रमण कर भारी तबाही मचाई थी। तब नगरवासियों ने अपनी रक्षा के लिए उससे एक समझौता किया था। समझौते की शर्तें अत्यंत क्रूर थीं:
- प्रत्येक सप्ताह नगर के एक परिवार को राक्षस के लिए भोजन की प्रचुर सामग्री भेजनी होगी।
- भोजन की इस सामग्री में दो भैंसे, बड़ी मात्रा में अन्न (चावल/रोटी) और मदिरा शामिल थी।
- सबसे वीभत्स शर्त यह थी कि जो व्यक्ति भोजन लेकर जाएगा, राक्षस उसे भी मारकर खा जाएगा।
इस क्रूर नियम के कारण नगर का हर घर बारी-बारी से अपने प्रियजनों की बलि चढ़ा रहा था।
ब्राह्मण परिवार का विलाप
एक दिन, जिस ब्राह्मण के घर पांडव ठहरे हुए थे, उस परिवार की बारी आ गई। पांडवों की माता कुंती ने अचानक उस घर से करुण रुदन (रोने की आवाज) सुना। वे उस कमरे में गईं जहाँ ब्राह्मण, उसकी पत्नी और पुत्री विलाप कर रहे थे।
- ब्राह्मण का तर्क: वह कह रहा था कि वह स्वयं जाएगा क्योंकि वह अपनी पत्नी और बच्चों को राक्षस का आहार बनते नहीं देख सकता।
- ब्राह्मण की पत्नी का तर्क: वह पति के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकती थी और अपने बच्चों के संरक्षण के लिए स्वयं की बलि देना चाहती थी।
- पुत्री का त्याग: नन्ही पुत्री भी अपने माता-पिता को बचाने के लिए स्वयं को समर्पित करने की बात कर रही थी।
यह दृश्य अत्यंत हृदयविदारक था। कुंती ने जब विलाप का कारण पूछा और पूरी घटना जानी, तो उनका मातृ-हृदय द्रवित हो उठा, किंतु साथ ही उनके भीतर का क्षत्रिय रक्त भी जाग उठा।
कुंती का अटूट संकल्प और भीम को आदेश
कुंती ने तुरंत निर्णय लिया कि वह अपने पुत्र भीम को उस राक्षस के पास भेजेंगी। जब उन्होंने ब्राह्मण को यह प्रस्ताव दिया, तो ब्राह्मण चौंक गया। उसने कहा, “हे देवी! आप हमारी अतिथि हैं। अतिथि की रक्षा करना हमारा धर्म है। मैं अपने प्राण बचाने के लिए आपके पुत्र को मृत्यु के मुख में कैसे भेज सकता हूँ?”
कुंती ने मुस्कुराते हुए ब्राह्मण को सांत्वना दी:
“हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! आप चिंता न करें। मेरा पुत्र साधारण नहीं है। वह महान शक्तिशाली और अस्त्र-शस्त्र का ज्ञाता है। उसने पूर्व में भी कई राक्षसों का अंत किया है। वह न केवल आपका भोजन लेकर जाएगा, बल्कि उस क्रूर असुर का अंत भी करेगा।”
जब युधिष्ठिर को यह पता चला, तो वे थोड़े चिंतित हुए क्योंकि भीम उनकी सबसे बड़ी शक्ति थे। किंतु कुंती ने उन्हें समझाया कि एक क्षत्रिय का धर्म पीड़ितों की रक्षा करना है और यह अवसर उस ब्राह्मण के ऋण को उतारने का है जिसने उन्हें शरण दी।
भीम का प्रस्थान: एक विचित्र यात्रा
अगले दिन भीमसेन राक्षस के लिए निर्धारित भोजन सामग्री लेकर वन की ओर चल दिए। भीम का व्यक्तित्व ही निराला था। उन्हें भोजन अत्यंत प्रिय था। जब वे बकासुर की गुफा के पास पहुँचे, तो उन्होंने बकासुर को पुकारने के बजाय स्वयं ही वह सारा भोजन खाना शुरू कर दिया। बकासुर, जो कई दिनों से भूखा था और भोजन की प्रतीक्षा कर रहा था, जब गुफा से बाहर आया तो उसने एक विशालकाय मनुष्य को अपना भोजन खाते देखा। यह देखकर उसका क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया।
महासंग्राम: भीम और बकासुर का द्वंद्व
बकासुर गर्जना करते हुए भीम की ओर झपटा। उसने एक विशाल वृक्ष उखाड़कर भीम पर प्रहार किया। भीम ने एक हाथ से वृक्ष को पकड़ लिया और मुस्कुराते हुए अपना भोजन करते रहे। बकासुर ने पत्थर, चट्टानें और बड़े-बड़े पेड़ भीम पर फेंके। भीम ने बड़ी कुशलता से उन्हें नष्ट कर दिया। जब भोजन समाप्त हो गया, तो भीम ने हाथ धोए और युद्ध के लिए तैयार हो गए। दोनों महाबलियों के बीच भीषण मलयुद्ध (Wrestling) शुरू हुआ। धरती कांपने लगी और वन के पशु-पक्षी भयभीत होकर भागने लगे। बकासुर भीम को उठाने का प्रयास करता, तो भीम उसे अपनी शक्ति से दबा देते। भीम ने राक्षस को थकाने की रणनीति अपनाई।
अंत में, भीम ने बकासुर को घुटनों के बल गिरा दिया। उन्होंने राक्षस की पीठ को अपने घुटने से दबाया और उसकी भुजाओं को पकड़कर उसे बीच से दो फाड़ कर दिया। बकासुर की भयानक चीख के साथ उसका अंत हो गया।
भीम ने बकासुर के शव को नगर के द्वार पर लाकर डाल दिया ताकि नगरवासी निर्भय हो सकें। उन्होंने ब्राह्मण परिवार को हिदायत दी कि वे किसी को यह न बताएं कि यह कार्य किसने किया है, क्योंकि पांडवों को अभी अपनी पहचान गुप्त रखनी थी।
इस घटना के मुख्य संदेश:
- सामाजिक उत्तरदायित्व: शक्तिशाली का कर्तव्य निर्बलों की रक्षा करना है।
- रणनीतिक बुद्धि: भीम ने न केवल बल का, बल्कि संयम का परिचय भी दिया।
- कृतज्ञता: शरण देने वाले के प्रति पांडवों की निष्ठा उनके चरित्र की महानता दर्शाती है।
बकासुर वध ने एकचक्रा नगरी को वर्षों के आतंक से मुक्त कराया और पांडवों के आत्मविश्वास को और सुदृढ़ किया।






