नदी, एजेंट और फर्जी पहचान: बांग्लादेश से भारत में घुसपैठ का पूरा तंत्र, आगरा में पकड़े गए 38 लोगों ने खोले राज
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संवाद 24 संवाददाता। भारत में अवैध घुसपैठ कोई एक घटना नहीं, बल्कि एक संगठित तंत्र का नतीजा है—जिसकी परतें आगरा में पकड़े गए 38 बांग्लादेशी नागरिकों की पूछताछ में खुलकर सामने आईं। जेल में सजा पूरी करने के बाद इन्हें वापस बांग्लादेश भेज दिया गया है, लेकिन उनके खुलासों ने सुरक्षा व्यवस्था, दस्तावेज़ी सत्यापन और सीमा प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नदी के रास्ते सीमा पार, फिर एजेंटों का जाल
पूछताछ में सामने आया कि सभी 38 लोग बांग्लादेश की फेनी नदी पार कर भारत में दाखिल हुए थे। सीमा के गांवों से उन्हें स्थानीय एजेंटों ने नदी पार कराई, फिर पश्चिम बंगाल और बिहार के रास्ते अलग-अलग राज्यों में भेज दिया गया। यह पूरा नेटवर्क पैसों के लेन-देन पर चलता है—जहां बांग्लादेश और भारत, दोनों ओर सक्रिय एजेंट मौजूद हैं।
फर्जी पहचान की फैक्ट्री
घुसपैठ के बाद सबसे अहम कदम होता है पहचान छिपाना। एजेंटों द्वारा फर्जी आधार कार्ड, वोटर कार्ड और पैन कार्ड तक तैयार कराए जाते हैं, ताकि अवैध प्रवासी सामान्य नागरिकों की तरह रह सकें। आगरा में पकड़े गए इन लोगों के पास भी ऐसे ही दस्तावेज़ बरामद हुए थे। यही कारण है कि वे लंबे समय तक सिस्टम की नजर से बचे रहते हैं।
कम प्रोफाइल, कम संपर्क काम की रणनीति
इन अवैध प्रवासियों की कार्यशैली भी सोची-समझी होती है। वे आम लोगों से दूरी बनाकर रखते हैं और कूड़ा, कबाड़ा व बायोमेडिकल वेस्ट इकट्ठा करने जैसे काम करते हैं—जहां पहचान की ज्यादा पूछताछ नहीं होती। खाली पड़ी जमीन देखकर झोपड़ियां बनाना और बस्तियां खड़ी करना उनकी आम रणनीति है, ताकि वे भीड़ में गुम रह सकें।
जी-20 से पहले हुआ था खुलासा
फरवरी 2023 में जी-20 सम्मेलन से पहले सिकंदरा क्षेत्र के आवास विकास कॉलोनी, सेक्टर-14 में झोपड़ी डालकर रह रहे बांग्लादेशियों को पुलिस ने पकड़ा था। उस समय बरामद फर्जी दस्तावेज़ों और पूछताछ में दिए गए बयानों ने नेटवर्क की गहराई उजागर की। एक आरोपी हालिम ने कई एजेंटों और मददगारों के नाम बताए, लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें भारत लाने और शरण देने वाले एजेंटों तक पुलिस नहीं पहुंच सकी।
सजा पूरी, सवाल बाकी
कानूनी प्रक्रिया के तहत सभी को जेल भेजा गया और सजा पूरी होने पर वापस बांग्लादेश भेज दिया गया। हालांकि, असली चुनौती अब भी बनी हुई है—जब तक एजेंटों और दस्तावेज़ तैयार करने वाले गिरोह पर शिकंजा नहीं कसा जाएगा, तब तक ऐसे मामले बार-बार सामने आते रहेंगे।
निष्कर्ष जड़ों पर वार जरूरी
आगरा का यह मामला बताता है कि अवैध घुसपैठ केवल सीमा की समस्या नहीं, बल्कि दस्तावेज़ी धोखाधड़ी, स्थानीय शरण और संगठित नेटवर्क का संयुक्त परिणाम है। समाधान भी बहुस्तरीय होना चाहिए—सीमा पर निगरानी, फर्जी दस्तावेज़ों पर सख्त कार्रवाई, एजेंट नेटवर्क का भंडाफोड़ और अंतर-राज्यीय समन्वय। तभी इस तंत्र की जड़ों पर प्रभावी वार संभव है।






