खंडहर में तब्दील होती आस्था: पुरवामीर का ठाकुरद्वारा मंदिर, जहां शंखनाद की जगह छलकते हैं जाम
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संवाद 24 संवाददाता। कानपुर जनपद के नरवल तहसील अंतर्गत विकासखंड सरसौल का पुरवामीर गांव कभी अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान के लिए जाना जाता था। इसी गांव का प्राचीन ठाकुरद्वारा मंदिर जो कभी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र था। आज उपेक्षा, अव्यवस्था और असामाजिक गतिविधियों की भेंट चढ़कर खंडहर में तब्दील होता जा रहा है। यह सिर्फ एक इमारत का क्षरण नहीं, बल्कि हमारी साझा धरोहर और स्मृतियों का बिखरना है।
सैकड़ों वर्षों की विरासत, चोरी से शुरू हुआ पतन
ग्रामीणों के अनुसार यह मंदिर सैकड़ों वर्ष पुराना है। गर्भगृह में माता सीता, श्रीराम और लक्ष्मण जी की अष्टधातु की मूर्तियां विराजमान थीं, जिनकी दिव्यता और कलात्मकता दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी। पूजा-पाठ, रामायण पाठ और पर्व-त्योहारों पर मंदिर जीवंत हो उठता था। लेकिन अज्ञात चोरों द्वारा मूर्तियों की चोरी ने मंदिर की आत्मा को जैसे छीन लिया। इसी घटना के बाद से उपेक्षा का सिलसिला शुरू हुआ और मंदिर धीरे-धीरे वीरान होने लगा।
आस्था का स्थल, असामाजिक तत्वों का अड्डा
आज स्थिति यह है कि जिस परिसर में कभी शंखनाद और घंटियों की गूंज सुनाई देती थी, वहां दिनभर शराबियों और जुआरियों का जमावड़ा रहता है। मंदिर परिसर असामाजिक तत्वों का अड्डा बन चुका है। टूटती दीवारें, बिखरा मलबा और गंदगी—यह सब उस विडंबना को उजागर करता है कि हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरें कैसे असुरक्षित हैं।
ग्रामीणों के प्रयास, पर सहयोग की कमी
पुरवामीर के ग्रामीणों ने कई बार चंदा इकट्ठा कर मंदिर के जीर्णोद्धार का प्रयास किया। साफ-सफाई, मरम्मत और सुरक्षा के लिए पहल भी हुई, लेकिन सीमित संसाधनों, प्रशासनिक सहयोग की कमी और निरंतर देखरेख के अभाव में हर कोशिश अधूरी रह गई। ग्रामीण बताते हैं कि मंदिर की संरचना आज भी मजबूत है; यदि समय रहते संरक्षण मिल जाए, तो इसे फिर से संवारना संभव है।
नीतियों और जमीनी हकीकत का अंतर
एक ओर सरकार प्राचीन मंदिरों की खोज, संरक्षण और संवर्धन की बात करती है, दूसरी ओर पुरवामीर का ठाकुरद्वारा मंदिर जैसी धरोहरें उपेक्षा का शिकार हैं। यह अंतर केवल योजनाओं का नहीं, बल्कि अमल का है। स्थानीय प्रशासन, पुरातत्व विभाग और जनप्रतिनिधियों की संयुक्त पहल से ही ऐसी धरोहरों को बचाया जा सकता है।
संरक्षण की पुकार
यह मंदिर सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि गांव की पहचान, इतिहास और आस्था का प्रतीक है। यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां इसे सिर्फ कहानियों में ही जान पाएंगी। आवश्यकता है—तत्काल संरक्षण, सुरक्षा व्यवस्था, नियमित पूजा और सामुदायिक सहभागिता की।
पुरवामीर का ठाकुरद्वारा मंदिर आज हमसे सवाल कर रहा है। क्या हम अपनी धरोहरों को बचाने के लिए समय रहते जागेंगे, या फिर इतिहास को खंडहरों में खो जाने देंगे?






