कोविड की मदद से जीता भरोसा, फिर रचा धर्मांतरण का जाल: कानपुर देहात में चौंकाने वाले खुलासे
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संवाद 24 संवाददाता। कानपुर देहात में कोविड-19 महामारी ने जब रोज़गार, भोजन और भविष्य—तीनों पर संकट खड़ा कर दिया था, तब छोटी-सी सहायता भी लोगों के लिए संजीवनी बन गई थी। इसी मानवीय संकट का लाभ उठाकर एक संगठित गिरोह ने पहले मदद और प्रशिक्षण के नाम पर विश्वास जीता, फिर धीरे-धीरे धर्मांतरण का सुनियोजित मकड़जाल बिछा दिया। पुलिस जांच में सामने आए तथ्य न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि किस तरह सामाजिक सेवा की आड़ में अवैध गतिविधियां संचालित की जा सकती हैं।
बंद स्कूल से ‘प्रशिक्षण केंद्र’ तक का सफर
अकबरपुर थाना क्षेत्र से महज एक किलोमीटर दूर, कोविड के दौरान बंद हुए एक स्कूल परिसर में ‘व्यवसायिक प्रशिक्षण केंद्र’ शुरू किया गया। सिलाई, कढ़ाई, बुनाई और अन्य तकनीकी कौशल सिखाने के नाम पर आर्थिक रूप से कमजोर और अनुसूचित जाति के लोगों को जोड़ा गया। शुरुआत में सहायता, प्रशिक्षण और छोटी-छोटी जरूरतों—यहां तक कि हैंडपंप लगवाने जैसी सुविधाओं से भरोसा पुख्ता किया गया। बाद में इसी भरोसे को धार्मिक प्रभाव में बदलने की कोशिशें शुरू हुईं।
एसआईटी की कार्रवाई और गिरफ्तारियां
कन्नौज जिले में धर्मांतरण के एक मामले में पन्नालाल की गिरफ्तारी के बाद कानपुर देहात से जुड़े तार सामने आए। एसपी श्रद्धा नरेंद्र पांडेय के निर्देश पर गठित एसआईटी ने जांच तेज की और ‘नवाकांति’ का संचालन करने वाले डेनियल शरद सिंह, हरिओम त्यागी और सावित्री शर्मा को गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार, आरोपी सूक्ष्म स्तर पर नेटवर्क फैलाकर जरूरतमंदों को अपने प्रभाव में लेते थे और बाइबिल रीडिंग से लेकर वेपटिस्म की प्रक्रिया के जरिए धर्मांतरण कराते थे।
हैंडपंप, केंद्र और कागज़ात सब जांच के दायरे में
जिले में करीब 50 हैंडपंप लगवाए जाने की जानकारी सामने आई है, जिन पर प्रति इकाई लगभग 50 हजार रुपये खर्च होने का अनुमान है। संस्था के भवन से मिले दस्तावेजों की गहन जांच जारी है। यह भी खंगाला जा रहा है कि कितने लोगों का धर्मांतरण कराया गया और क्या इसके तार अन्य जिलों या राज्यों से जुड़े हैं।
क्लब सिस्टम से हर उम्र पर पकड़
पूछताछ में यह भी खुलासा हुआ कि आरोपी आयु वर्ग और शिक्षा स्तर के अनुसार अलग-अलग ‘क्लब’ चलाते थे।
गृह कलीसिया: गांव स्तर पर किसी घर को अस्थायी चर्च बनाकर प्रार्थना सभाएं, गरीबी से मुक्ति के दावे और धर्म की ‘खूबियां’ बताकर लोगों को प्रभावित किया जाता था।
अवाना समूह: विशेष रूप से बच्चों को लक्षित कर गतिविधियां संचालित की जाती थीं।
इसके अलावा वीडियो बाइबिल रीडिंग स्कूल, वोकेशनल सेंटर, प्रौढ़ शिक्षा केंद्र और सिलाई प्रशिक्षण केंद्र भी चलाए गए। धर्मांतरण के बाद सक्रिय व्यक्तियों को जिला स्तर का ‘पादरी’ तक घोषित कर दिया जाता था।
कानूनी शिकंजा और सख्ती
कन्नौज में हुई प्रक्रियात्मक चूक से सीख लेते हुए पुलिस ने इस बार तत्परता दिखाई। निबौली निवासी रामभरोसे की शिकायत पर दर्ज एफआईआर में उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धाराएं 3, 5(1), 5(2) और 5(3) जोड़ी गईं।
धारा 3: महिला, नाबालिग या अनुसूचित जाति के लोगों के साथ धोखाधड़ी कर धर्मांतरण—पांच साल तक की सजा।
धारा 5(1): जबरन धर्मांतरण—तीन साल तक की सजा।
धारा 5(2): विदेशी फंडिंग से धर्मांतरण—अधिकतम 14 साल की सजा और जुर्माना।
सबक और चेतावनी
यह मामला बताता है कि आपदा के समय की गई मदद कैसे शोषण का हथियार बन सकती है। प्रशासन के लिए यह चेतावनी है कि सामाजिक सेवा के नाम पर चल रही संस्थाओं की सतत निगरानी जरूरी है, वहीं समाज के लिए भी कि सहायता और प्रलोभन के बीच के फर्क को समझना उतना ही आवश्यक है। जांच जारी है और आने वाले दिनों में और भी बड़े खुलासों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।






