50 हजार से ज़्यादा गीत, सुरों का महासागर और पुरस्कारों से भी बड़ा आत्मसम्मान

Share your love

संवाद 24,डेस्क। भारतीय संगीत इतिहास में कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जो केवल सुनाई नहीं देतीं, बल्कि पीढ़ियों की स्मृतियों में बस जाती हैं। ऐसी ही एक दिव्य आवाज़ है उस गायक की, जिसने गायन को केवल पेशा नहीं बल्कि साधना बनाया। यह वही कलाकार हैं जिन्होंने 50,000 से अधिक गीत गाकर एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया, जिसे छूना भी आसान नहीं और जिन्होंने एक समय यह तक कह दिया कि अब उन्हें पुरस्कारों की आवश्यकता नहीं है। वो थी लता मंगेशकर जी जिन्होंने अपने आवाज के जादू से सभी को मोह लिया था।

बचपन से ही सुरों से जुड़ा जीवन
लता जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ जहाँ संगीत रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा था। घर में रियाज़, सुरों की चर्चा और संगीत की समझ बचपन से ही विकसित होने लगी। बहुत कम उम्र में उन्होंने मंच पर गाना शुरू कर दिया और लोगों को यह एहसास हो गया कि यह आवाज़ सामान्य नहीं है।

संगीत को माना ईश्वर की आराधना
उनके लिए संगीत केवल मनोरंजन नहीं बल्कि ईश्वर से संवाद का माध्यम था। वे मानते थे कि सुरों की शुद्धता ही कलाकार की पहचान होती है। यही वजह रही कि उन्होंने कभी लोकप्रियता के लिए संगीत से समझौता नहीं किया और हर गीत को पूरे समर्पण के साथ गाया।

फिल्मी दुनिया में ऐतिहासिक प्रवेश
जब उन्होंने फिल्मी संगीत की दुनिया में कदम रखा, तब प्लेबैक सिंगिंग का स्तर पहले से ही ऊँचा था। बावजूद इसके, उनकी आवाज़ ने अपनी अलग पहचान बनाई। पहले दक्षिण भारतीय फिल्मों में और फिर धीरे-धीरे पूरे देश में उनकी मांग बढ़ने लगी।

भाषाओं की कोई सीमा नहीं
लता जी की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने भाषा को कभी बाधा नहीं बनने दिया। हिंदी, तमिल, मलयालम, तेलुगु, कन्नड़, बंगाली, मराठी से लेकर विदेशी भाषाओं तक , हर जगह उनकी आवाज़ ने समान प्रभाव छोड़ा। श्रोता भाषा नहीं, भावना सुनते थे।

50,000 से अधिक गीतों का अद्भुत रिकॉर्ड
इतने गीत गाना केवल संख्या नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, अनुशासन और मानसिक मजबूती का प्रमाण है। उन्होंने हर शैली में गाया , रोमांटिक, भक्ति, शास्त्रीय, लोक और आधुनिक। हर गीत में वही ताजगी और आत्मा झलकती रही।

पुरस्कारों की लंबी कतार
उनके योगदान को देखते हुए उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असंख्य सम्मान मिले। बड़े-बड़े मंचों पर उनका नाम सम्मान के साथ लिया गया। पुरस्कार उनके लिए सम्मान थे, लेकिन कभी उद्देश्य नहीं बने।

अब और पुरस्कार नहीं चाहिए विनम्रता की मिसाल
एक समय ऐसा आया जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह कहा कि उन्हें अब और अवॉर्ड नहीं दिए जाएँ। उनका मानना था कि जब कला का उद्देश्य पूरा हो जाए और जनता का प्रेम मिल जाए, तो ट्रॉफी केवल औपचारिकता बन जाती है।

भक्ति संगीत में आत्मा की आवाज़
भक्ति गीतों में उनकी गायकी सुनते ही श्रोता ध्यान की अवस्था में चला जाता था। मंदिरों, सभाओं और आध्यात्मिक आयोजनों में उनके गीत आज भी श्रद्धा के साथ बजाए जाते हैं।

फिल्मों में भावनाओं का सजीव चित्रण
फिल्मी गीतों में उन्होंने केवल गाया नहीं, बल्कि किरदार की भावनाओं को अपनी आवाज़ में ढाल दिया। यही कारण रहा कि उनके गाए गीत दृश्य से भी ज़्यादा यादगार बन गए।

छह दशकों तक चला संगीत का सफर
जहाँ कई कलाकार समय के साथ फीके पड़ जाते हैं, वहीं लत जी हर दशक में प्रासंगिक बनी रहीं। उनकी आवाज़ में उम्र का असर कभी नहीं दिखा, बल्कि अनुभव की गहराई और बढ़ती चली गई।

अनुशासन और सादगी से भरा जीवन
वे हमेशा सादगी में विश्वास रखती थीं। दिखावे से दूर, नियमित रियाज़ और आत्मसंयम , यही उनके जीवन के मूल मंत्र रहे। यही अनुशासन उनकी गायकी में भी झलकता था।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
आज भी युवा गायक उन्हें अपना आदर्श मानते हैं। संगीत स्कूलों में उनकी गायकी को उदाहरण के रूप में पढ़ाया जाता है। आज वो सिर्फ एक गायक नहीं, बल्कि एक संगीत संस्थान की तरह मानी जाती हैं।

रिकॉर्डिंग स्टूडियो से मंदिर तक
उनकी आवाज़ स्टूडियो तक सीमित नहीं रही। मंदिरों, सभागृहों और संगीत सम्मेलनों में भी वही श्रद्धा और सम्मान मिला, जो किसी आध्यात्मिक गुरु को मिलता है।

संगीत इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में नाम
भारतीय संगीत का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, तो लता जी का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होगा। 50 हजार से अधिक गीत, अनगिनत भाषाएँ और अथाह सम्मान , यह उपलब्धि दुर्लभ है।

जनता का प्रेम सबसे बड़ा पुरस्कार
उन्होंने हमेशा कहा कि श्रोताओं का प्रेम ही उनका असली सम्मान है। जब कोई अनजान व्यक्ति भी उनकी आवाज़ पहचान ले, वही उनके लिए सबसे बड़ा अवॉर्ड है।

एक आवाज़, जो कभी पुरानी नहीं होगी
समय बदलेगा, संगीत की शैली बदलेगी, लेकिन यह आवाज़ कभी पुरानी नहीं पड़ेगी। यह सुरों की वह धरोहर है, जो आने वाली पीढ़ियों को भी उतनी ही गहराई से छुएगी।

सुरों का सच्चा साधक
यह कहानी सिर्फ एक गायक की नहीं, बल्कि उस साधक की है जिसने संगीत को जीवन और जीवन को संगीत बना दिया। पुरस्कारों से ऊपर उठकर, उन्होंने कला को सर्वोच्च स्थान दिया , और यहीं से वे अमर हो गए।

Manvendra Somvanshi
Manvendra Somvanshi

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Get regular updates on your mail from Samvad 24 News