8वें वेतन आयोग के बाद निजी कर्मचारियों पर सरकार का फोकस, EPFO की सैलरी लिमिट 30 हजार तक बढ़ाने की तैयारी
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संवाद 24 नई दिल्ली। केंद्रीय कर्मचारियों के लिए 8वें वेतन आयोग की प्रक्रिया आगे बढ़ने के बीच अब सरकार का ध्यान निजी क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों कर्मचारियों की ओर गया है। केंद्र सरकार कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के तहत आने वाली मासिक सैलरी लिमिट को मौजूदा 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 से 30,000 रुपये करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। इस कदम का उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा कर्मचारियों को सोशल सिक्योरिटी के दायरे में लाना है।
क्या है मौजूदा नियम
फिलहाल EPFO के नियमों के अनुसार, जिन कर्मचारियों की बेसिक सैलरी 15,000 रुपये तक है, उनके लिए पीएफ योगदान अनिवार्य है। इससे ज्यादा बेसिक सैलरी होने पर पीएफ कटौती कर्मचारी और नियोक्ता की सहमति पर निर्भर करती है। लिमिट बढ़ने के बाद बड़ी संख्या में प्राइवेट सेक्टर कर्मचारी अनिवार्य पीएफ के दायरे में आ जाएंगे।
पहले भी आया था प्रस्ताव
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इससे पहले भी सैलरी लिमिट को 25,000 रुपये करने का प्रस्ताव सामने आया था, लेकिन निजी कंपनियों ने लागत बढ़ने का हवाला देकर इसका विरोध किया था। वहीं कर्मचारी संगठनों की मांग है कि यह सीमा सीधे 30,000 रुपये की जाए, ताकि रिटायरमेंट सुरक्षा मजबूत हो सके।
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
इस मुद्दे को हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी गंभीरता से लिया है। शीर्ष अदालत ने श्रम मंत्रालय से कहा है कि EPFO की सैलरी लिमिट की समीक्षा चार महीने के भीतर की जाए। उल्लेखनीय है कि मौजूदा 15,000 रुपये की सीमा सितंबर 2014 में तय की गई थी, जबकि पिछले एक दशक में निजी क्षेत्र में वेतन स्तर में बड़ा बदलाव आया है।
कर्मचारियों को क्या होगा फायदा यदि सैलरी लिमिट बढ़ाई जाती है तो:
- EPFO सब्सक्राइबर्स की संख्या में बड़ा इजाफा होगा
- असंगठित और निजी क्षेत्र के अधिक कर्मचारी रिटायरमेंट फंड से जुड़ सकेंगे
- ज्यादा योगदान के कारण कंपाउंडिंग का लाभ बढ़ेगा
- रिटायरमेंट के समय कर्मचारियों को बड़ी जमा राशि मिलेगी
हाल ही में EPFO ने निकासी नियमों में ढील दी है, लेकिन साथ ही यह शर्त भी जोड़ी है कि खाते में न्यूनतम 25 प्रतिशत बैलेंस बनाए रखना अनिवार्य होगा।
कंपनियों की चिंता बरकरार
हालांकि उद्योग जगत का मानना है कि सैलरी लिमिट बढ़ने से नियोक्ताओं पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा, क्योंकि उन्हें भी समान अनुपात में योगदान देना होगा। इसके बावजूद सरकार का रुख साफ है कि सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाना अब प्राथमिकता बन चुका है।
यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो इसे निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए हाल के वर्षों का सबसे बड़ा सोशल सिक्योरिटी सुधार माना जाएगा।






