जब नारी सुरक्षित, सम्मानित और सशक्त होती है, तभी सभ्यता सच में जीवित रहती है
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संवाद 24 भोपाल। भारतीय समाज, संस्कृति और सभ्यता की जड़ें जितनी गहरी हैं, उतनी ही सुदृढ़ उसकी मातृशक्ति रही है। इतिहास के हर मोड़ पर चाहे वह वैदिक काल हो, मध्यकालीन संघर्ष हों या आधुनिक भारत की पुनर्रचना, नारी ने केवल सहायक की नहीं, बल्कि निर्णायक भूमिका निभाई है। इसी सनातन सत्य को पुनः रेखांकित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने भोपाल में आयोजित ‘मातृशक्ति संवाद’ कार्यक्रम में कहा कि जहां नारी का सम्मान और स्थान सुरक्षित होता है, वहां समाज स्वतः ही स्वस्थ, संतुलित और सशक्त रहता है।
यह कार्यक्रम संघ के शताब्दी वर्ष के निमित्त शिवनेरी भवन में आयोजित किया गया था, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों की महिलाओं की सहभागिता देखने को मिली। मंच पर सरसंघचालक जी के साथ प्रांत संघचालक अशोक पांडेय जी और विभाग संघचालक सोमकांत उमालकर जी की गरिमामयी उपस्थिति रही। यह केवल एक भाषण या आयोजन नहीं था, बल्कि भारतीय समाज के भविष्य को दिशा देने वाला वैचारिक संवाद था, जिसमें नारी की भूमिका को केंद्र में रखकर सामाजिक चुनौतियों और समाधानों पर गहन विचार किया गया।

सभ्य समाज की कसौटी: नारी का स्थान और सम्मान
डॉ. मोहन भागवत जी ने अपने संबोधन की शुरुआत एक मूल प्रश्न से की, सभ्य समाज आखिर होता क्या है? उन्होंने स्पष्ट किया कि सभ्यता केवल आर्थिक प्रगति, तकनीकी विकास या भौतिक सुविधाओं से नहीं मापी जा सकती। किसी भी समाज की वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि वहां महिलाओं को कितना सम्मान, सुरक्षा और अवसर मिलता है। यदि नारी भयमुक्त है, सम्मानित है और निर्णय प्रक्रिया में सहभागी है, तो समझना चाहिए कि वह समाज सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय धर्म और संस्कृति की निरंतरता का सबसे बड़ा कारण मातृशक्ति रही है। आक्रमणों, दासता और सांस्कृतिक दबावों के दौर में भी यदि भारत अपनी पहचान बचाए रख सका, तो उसके पीछे घर-घर में मां द्वारा दिए गए संस्कारों की भूमिका रही है। मंदिर टूट सकते हैं, शासन बदल सकते हैं, लेकिन मां द्वारा बच्चों के मन में रोपे गए संस्कार पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं।
घर तक सीमित नहीं, समाज का नेतृत्व करती नारी
सरसंघचालक जी ने यह भी रेखांकित किया कि वह दौर अब समाप्त हो चुका है, जब महिलाओं को केवल सुरक्षा के नाम पर घर की चारदीवारी तक सीमित रखने की सोच प्रचलित थी। आज का समाज इस तथ्य को स्वीकार कर चुका है कि परिवार और समाज दोनों को आगे बढ़ाने में स्त्री और पुरुष की संयुक्त भूमिका होती है। इसलिए केवल महिलाओं का नहीं, बल्कि दोनों का वैचारिक प्रबोधन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सशक्तिकरण का अर्थ केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता नहीं है। सच्चा सशक्तिकरण तब होता है, जब महिला अपने विचार, निर्णय और आचरण में आत्मविश्वासी हो, अपने अधिकारों के प्रति सजग हो और अपने कर्तव्यों को भी समझती हो। समाज को यह समझना होगा कि महिला को अवसर देना कोई उपकार नहीं, बल्कि समाज के समग्र विकास के लिए आवश्यक निवेश है।
मातृशक्ति संवाद: केवल कार्यक्रम नहीं, सामाजिक मंथन
‘मातृशक्ति संवाद’ को संबोधित करते हुए डॉ. भागवत जी ने कहा कि ऐसे आयोजन केवल औपचारिक मंच नहीं होने चाहिए, बल्कि आत्ममंथन और आत्मचिंतन का माध्यम बनने चाहिए। समाज में महिलाओं की स्थिति, उनके सामने आने वाली चुनौतियां और उनके समाधान, इन सभी विषयों पर खुला और ईमानदार संवाद आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जब तक परिवार, समाज और संस्थाएं मिलकर प्रयास नहीं करेंगी, तब तक महिला सशक्तिकरण अधूरा रहेगा। यह केवल कानून या नीतियों से संभव नहीं है। इसके लिए सामाजिक वातावरण बदलना होगा, सोच बदलनी होगी और सबसे पहले अपने घरों से शुरुआत करनी होगी।
संवाद का अभाव और आधुनिक सामाजिक संकट
लव जिहाद जैसे संवेदनशील विषय पर बोलते हुए सरसंघचालक जी ने स्पष्ट किया कि इसकी रोकथाम का सबसे पहला दायित्व परिवार का है। यह केवल बाहरी साजिश या कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद का भी विषय है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि यदि परिवार में नियमित संवाद होता, विश्वास का वातावरण होता, तो कोई बेटी किसी अपरिचित के बहकावे में कैसे आ सकती है? उन्होंने कहा कि आज परिवारों में संवाद का अभाव बढ़ता जा रहा है। माता-पिता और बच्चों के बीच भावनात्मक दूरी, व्यस्त जीवनशैली और तकनीकी निर्भरता ने संवाद को सीमित कर दिया है। परिणामस्वरूप बच्चे अपनी जिज्ञासाओं और समस्याओं के समाधान बाहर खोजने लगते हैं, जो कई बार उन्हें गलत दिशा में ले जाता है।
समाधान के तीन स्तर: परिवार, संस्कार और समाज
डॉ. मोहन भागवत जी ने इस समस्या के समाधान के लिए तीन स्तरों पर प्रयास की आवश्यकता बताई। पहला परिवार के भीतर निरंतर, खुला और विश्वासपूर्ण संवाद। दूसरा बच्चियों को सावधानी, आत्मरक्षा और आत्मविश्वास के संस्कार देना। तीसरा ऐसे अपराधों में लिप्त लोगों के विरुद्ध त्वरित और प्रभावी निस्तारण। उन्होंने समाज में कार्यरत संस्थाओं की भूमिका पर भी जोर दिया। उनका कहना था कि यदि समाज सजग होगा, सूचित होगा और सामूहिक प्रतिकार के लिए खड़ा होगा, तभी ऐसी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाया जा सकेगा। यह केवल पुलिस या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है।
नारी: सीमित नहीं, सशक्त और असाधारण
लैंगिक भेदभाव और उत्पीड़न के संदर्भ में सरसंघचालक जी ने भारतीय और पश्चिमी दृष्टिकोण की तुलना करते हुए के विचारों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पश्चिमी समाज में महिला का सामाजिक स्थान अक्सर विवाह के बाद तय होता है, जबकि भारतीय परंपरा में महिला का स्थान मातृत्व से और भी ऊंचा हो जाता है। मातृत्व केवल जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि संस्कारों का संवाहक है। मां ही बच्चे के भीतर समाज, संस्कृति और राष्ट्र के प्रति भावनाएं जाग्रत करती है। इसलिए भारतीय संस्कृति में मातृत्व को सर्वोच्च सम्मान दिया गया है।
अंधी आधुनिकता और संस्कारों का प्रश्न
डॉ. भागवत जी ने चेताया कि आधुनिकता के नाम पर जो अंधा पश्चिमीकरण थोपा जा रहा है, वह समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। उन्होंने कहा कि आधुनिक होना गलत नहीं, लेकिन अपनी जड़ों को काटकर आधुनिक बनना आत्मघाती है। हमें यह गंभीरता से सोचना होगा कि हम अपने बच्चों को किस प्रकार के संस्कार दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा महिलाओं को कमजोर या सीमित नहीं मानती, बल्कि उन्हें शक्ति, साहस और नेतृत्व का प्रतीक मानती है। इतिहास में ऐसी असंख्य उदाहरण हैं, जहां नारी ने असाधारण साहस का परिचय दिया है।
इतिहास की साक्षी: भारतीय नारी का शौर्य
सरसंघचालक जी ने का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय नारी ने हर कालखंड में शक्ति और साहस का परिचय दिया है। झांसी की रानी केवल एक योद्धा नहीं थीं, बल्कि आत्मसम्मान, स्वतंत्रता और कर्तव्यबोध की प्रतीक थीं। ऐसे उदाहरण यह सिद्ध करते हैं कि भारतीय संस्कृति में नारी को कभी भी निर्बल नहीं माना गया।
कुटुंब व्यवस्था की धुरी: महिला
डॉ. मोहन भागवत जी ने परिवार व्यवस्था में महिलाओं की केंद्रीय भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि परिवार में मुख्य भूमिका महिलाओं की होती है, क्योंकि वही पालनकर्ता और सृजनकर्ता है। परंपरागत रूप से कमाई और बाहरी सुरक्षा पुरुष का दायित्व रहा, लेकिन परिवार को भावनात्मक, नैतिक और सांस्कृतिक रूप से संभालने का कार्य महिलाओं ने ही किया है। कुटुंब में संतुलन, संवेदना और व्यवस्था बनाए रखने की दृष्टि मुख्य रूप से महिला की होती है। इसलिए यदि परिवार मजबूत होगा, तो समाज भी मजबूत होगा और यदि समाज मजबूत होगा, तो राष्ट्र स्वतः सशक्त बनेगा।
‘स्व’ आधारित जीवनशैली और नारी की भूमिका
सरसंघचालक जी ने ‘स्व’ आधारित जीवनशैली की चर्चा करते हुए कहा कि घर के ‘स्व’ को गढ़ने में महिला की भूमिका होती है और वही भूमिका देश के ‘स्व’ को सुदृढ़ करने में भी होनी चाहिए। आत्मगौरव, आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान ये सभी भाव घर से ही विकसित होते हैं और इसमें मां की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।
मानसिक तनाव, अकेलापन और परिवार की जिम्मेदारी
मानसिक तनाव और आत्महत्या जैसे गंभीर विषयों पर बोलते हुए डॉ. भागवत जी ने कहा कि घर में कोई भी व्यक्ति अकेला महसूस न करे, यह अत्यंत आवश्यक है। अपनापन न मिलने से व्यक्ति भीतर ही भीतर टूटने लगता है, जो मानसिक तनाव का बड़ा कारण बनता है। उन्होंने माता-पिता को सलाह दी कि बच्चों पर असंभव लक्ष्य न थोपें। हर बच्चे की रुचि, क्षमता और स्वभाव अलग होता है। सफलता से अधिक महत्वपूर्ण जीवन की सार्थकता है, यह समझ बच्चों में विकसित करना परिवार की जिम्मेदारी है।
मातृशक्ति: राष्ट्र निर्माण की निर्णायक शक्ति
सरसंघचालक जी ने कहा कि गुलामी का दौर समाप्त हो चुका है और अब भारत मानसिक दासता से भी बाहर निकल रहा है। विश्व आज भारत की ओर आशा भरी दृष्टि से देख रहा है। इस ऐतिहासिक समय में देश की लगभग 50 प्रतिशत आबादी महिलाओं की भूमिका निर्णायक हो जाती है। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में महिलाएं समाज और राष्ट्र के लिए कार्य कर रही हैं, लेकिन अभी भी बहुत सी महिलाएं इस प्रक्रिया से नहीं जुड़ी हैं। ऐसी महिलाओं के प्रबोधन के लिए विशेष प्रयास करने होंगे, ताकि वे भी अपनी भूमिका को पहचान सकें।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते: श्लोक नहीं, जीवन दर्शन
डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है। जहां नारी का सम्मान होता है, वहां देवत्व स्वयं प्रकट होता है। यह सम्मान केवल शब्दों या प्रतीकों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि व्यवहार, नीति और सामाजिक संरचना में दिखाई देना चाहिए।
नई चुनौतियां और सांस्कृतिक सजगता
उन्होंने कहा कि आज सांस्कृतिक आक्रमण के रूप में नई चुनौतियां सामने हैं, जिन्हें कक्चरल मार्क्सिज्म और वोकिज़्म जैसे नाम दिए जाते हैं। इनका सामना करने के लिए अपने धर्म, मूल्यों और संस्कारों को गहराई से समझना आवश्यक है। केवल विरोध पर्याप्त नहीं, बल्कि वैचारिक स्पष्टता और आत्मविश्वास जरूरी है।
ऐतिहासिक कालखंड और हमारी जिम्मेदारी
अपने संबोधन के अंत में सरसंघचालक जी ने विश्वास जताया कि जब देश की मातृशक्ति इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाएगी, तब समाज और राष्ट्र दोनों को सशक्त बनाना संभव होगा। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में हम जो कार्य करेंगे, वही आने वाले सैकड़ों वर्षों तक स्मरण रखा जाएगा।
कार्यक्रम का समापन समाज में मातृशक्ति की केंद्रीय भूमिका और राष्ट्र निर्माण के संकल्प तथा ‘वंदे मातरम’ के उद्घोष के साथ हुआ। यह केवल एक आयोजन का समापन नहीं, बल्कि एक वैचारिक यात्रा की शुरुआत थी, जिसका लक्ष्य है सशक्त नारी, सुदृढ़ परिवार और समर्थ भारत।






