सामाजिक सद्भाव से सशक्त भारत, सेवा और त्याग से राष्ट्र निर्माण का संदेश
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संवाद 24 भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर भोपाल स्थित कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में आयोजित सामाजिक सद्भाव बैठक केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की उस वैचारिक यात्रा का सशक्त पड़ाव थी, जिसमें समाज की विविध धाराएँ एक साझा लक्ष्य सशक्त, समरस और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एकत्र हुईं। इस अवसर पर समाज के विभिन्न वर्गों, संगठनों और विचारधाराओं के प्रतिनिधियों की उल्लेखनीय सहभागिता ने यह स्पष्ट किया कि सामाजिक सद्भाव आज केवल आवश्यकता नहीं, बल्कि समय की अनिवार्यता बन चुका है।

सामाजिक सद्भाव: भारतीय समाज का स्वभाव
बैठक को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने सामाजिक सद्भाव को किसी आधुनिक अवधारणा के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय समाज की मूल प्रवृत्ति के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने कहा कि भारत की सामाजिक संरचना सदियों से विविधता में एकता का उदाहरण रही है। यहाँ अलग-अलग पंथ, पूजा पद्धतियाँ, भाषाएँ और जीवनशैलियाँ होते हुए भी समाज एक साझा सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा रहा है।
समाज शब्द का गहन अर्थ
डॉ. भागवत ने ‘समाज’ शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि समाज वह समूह है जो समान गंतव्य की ओर अग्रसर होता है। भारतीय समाज की कल्पना हमेशा ऐसी रही है जिसमें जीवन भौतिक और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर संतुलित और सुखी हो। यही संतुलन भारत की विशिष्ट पहचान है, जिसने उसे सहिष्णु, समावेशी और जीवंत बनाए रखा।
ऋषि परंपरा और सांस्कृतिक नींव
उन्होंने स्मरण कराया कि हमारे ऋषि-मुनियों ने अस्तित्व की एकता को पहचाना। उन्होंने यह समझा कि भिन्नता केवल दृष्टिकोण की होती है, सत्य एक ही रहता है। उनकी तपस्या, साधना और जीवन-दर्शन ने ही भारतीय राष्ट्र और संस्कृति की नींव रखी, जो आज भी समाज को जोड़ने वाली अदृश्य शक्ति के रूप में कार्य कर रही है।
कानून नहीं, सद्भाव समाज को जोड़ता है
सरसंघचालक ने स्पष्ट किया कि कानून समाज को नियंत्रित कर सकता है, परंतु समाज को जोड़कर रखने का कार्य केवल सद्भावना कर सकती है। जब तक समाज के भीतर विश्वास, संवाद और सहयोग की भावना जीवित रहती है, तब तक कोई भी बाहरी चुनौती समाज को विभाजित नहीं कर सकती।
विविधता में एकता: भारतीय पहचान
उन्होंने कहा कि भारत की पहचान उसकी विविधता में एकता है। बाहरी रूप से भिन्नता हो सकती है, लेकिन राष्ट्र, संस्कृति और मूल्यों के स्तर पर हम सभी एक हैं। इसी विविधता को स्वीकार कर एकता के सूत्र में पिरोना ही हिन्दू समाज की विशेषता रही है।
हिन्दू: एक स्वभाव, एक जीवन दृष्टि
डॉ. भागवत ने ‘हिन्दू’ शब्द को किसी संज्ञा के बजाय एक स्वभाव बताया। उन्होंने कहा कि हिन्दू वह है जो मत, पूजा पद्धति या जीवनशैली के आधार पर संघर्ष नहीं करता, बल्कि समन्वय और सह-अस्तित्व में विश्वास रखता है। यही दृष्टि भारतीय समाज को स्थायित्व प्रदान करती है।
भ्रम और विभाजन के प्रयास
उन्होंने चेताया कि समाज में भ्रम फैलाकर जनजातीय और अन्य वर्गों को अलग बताने के प्रयास किए गए हैं। जबकि सच्चाई यह है कि हजारों वर्षों से इस भूमि पर रहने वाले सभी लोगों की सांस्कृतिक जड़ें एक ही हैं। समाज को इस तथ्य को समझते हुए ऐसे विभाजनकारी प्रयासों से सतर्क रहना होगा।
सद्भावना संवाद की आवश्यकता
डॉ. भागवत ने कहा कि सद्भाव केवल संकट के समय नहीं, बल्कि सामान्य समय में भी बनाए रखना आवश्यक है। इसके लिए मिलना, संवाद करना और एक-दूसरे के कार्यों को जानना पहली शर्त है। समर्थ को दुर्बल की सहायता करनी चाहिए, यही सामाजिक उत्तरदायित्व है।
समाज से राष्ट्र तक का भाव
प्रथम सत्र में प्रख्यात कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा ने अपने आशीर्वचन में समाज और राष्ट्र के संबंध को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि सभी समाज अपने-अपने स्तर पर कार्य कर रहे हैं, पर यह आत्ममंथन भी आवश्यक है कि हमने राष्ट्र के लिए क्या किया और राष्ट्र को क्या दिया।

संघ और शिव: सेवा और त्याग की समानता
पंडित प्रदीप मिश्रा ने संघ और भगवान शिव के भाव में अद्भुत समानता बताते हुए कहा कि जैसे शिव ने समस्त सृष्टि की रक्षा के लिए विष पिया, वैसे ही संघ भी प्रतिदिन आरोपों का विष पीकर संयम और राष्ट्रहित में कार्य करता है। यह त्याग और सेवा की परंपरा ही राष्ट्र को मजबूत बनाती है। उन्होंने कहा कि जन्म चाहे किसी भी जाति या वर्ग में हुआ हो, पहचान अंततः हिन्दू, सनातनी और भारतीय की ही है। प्रत्येक भारतीय में राष्ट्रोत्थान और समाजोत्थान की अपार क्षमता है, जिसे जागृत करने की आवश्यकता है।
धर्मांतरण पर सजगता का आह्वान
पंडित प्रदीप मिश्रा ने धर्मांतरण को केवल वर्तमान पीढ़ी तक सीमित न मानते हुए आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करने वाला गंभीर षड्यंत्र बताया। उन्होंने समाज से अपील की कि वह इस विषय पर सजग, जागरूक और संगठित रहे।
ग्रीन महाशिवरात्रि: समरसता का उदाहरण
उन्होंने ‘ग्रीन महाशिवरात्रि’ जैसे अभियानों का उल्लेख करते हुए कहा कि घर-घर मिट्टी के शिवलिंग की पूजा सामाजिक समरसता का सशक्त उदाहरण है। ऐसे अभियान पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ सामाजिक एकता को भी मजबूत करते हैं।
सामाजिक सद्भाव बैठक का उद्देश्य
इस बैठक का मूल उद्देश्य केवल विचार-विमर्श नहीं, बल्कि समाज को साथ लेकर आगे बढ़ने का संकल्प था। पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा कि जैसे लंगर में जाति नहीं पूछी जाती, वैसे ही राष्ट्र निर्माण के लिए सभी को बिना भेदभाव एकजुट होकर कार्य करना चाहिए।
समाज की सहभागिता और प्रतिवेदन
कार्यक्रम के प्रारंभ में विभिन्न समाजों और संगठनों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्रों में किए जा रहे कार्यों का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। इन प्रस्तुतियों ने यह स्पष्ट किया कि समाज के भीतर सकारात्मक ऊर्जा और रचनात्मक प्रयासों की कोई कमी नहीं है।
स्वयं समाधान की दिशा में समाज
बैठक का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि समाज अपने क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए स्वयं आगे आएगा और सरकार की प्रतीक्षा किए बिना सामूहिक प्रयास करेगा। यह आत्मनिर्भरता ही सशक्त राष्ट्र की आधारशिला है।
एक समाज, एक राष्ट्र का संकल्प
यह सामाजिक सद्भाव बैठक किसी एक संगठन तक सीमित नहीं थी। यह सम्पूर्ण हिन्दू समाज की साझा पहल थी, जिसका उद्देश्य पूरे समाज को संगठित कर राष्ट्र को बलशाली बनाना है। संदेश स्पष्ट था, जब समाज एकजुट होता है, तब राष्ट्र स्वतः सशक्त होता है।
सद्भाव से सुदृढ़ भविष्य
अंततः हम कह सकते हैं कि भोपाल की यह बैठक आने वाले समय के लिए एक वैचारिक दिशा-सूचक बनकर उभरी। सामाजिक सद्भाव, संवाद, सहयोग और साझा उत्तरदायित्व, यही वे स्तंभ हैं जिन पर एक मजबूत, समरस और आत्मविश्वासी भारत का निर्माण संभव है। संवाद 24 के माध्यम से यह संदेश स्पष्ट रूप से सामने आता है कि राष्ट्र निर्माण केवल नीतियों से नहीं, बल्कि समाज की चेतना और सहभागिता से होता है।






